Monday, October 3, 2011

सृष्टि की आदि शक्ति हैं मां दुर्गा

आदि शक्ति हैं मां दुर्गा। देवताओं पर मां भगवती की कृपा रहती है। समस्त देव उन्हीं की शक्ति से प्रेरित होकर कार्य   करते हैं। यहां तक की ब्रह्मï विष्णु और महेश बिना भगवती की  इच्छा या शक्ति से सर्जन, पोषण एवं संहार नहीं कर पाते हैं। परमेश्वरी के नौ रूप हैं। उन्हें अनेक  नामों से जाना जाता है। इन नौ रूपों का  अलग-अलग आध्यात्मिक  महत्व है। देवी के नौ रूपों का वर्णन दुर्गा सप्तशती में भी मिलता है। देवी के  रूपों का रहस्योद्घाटन प्रजापति ब्रह्मï ने मार्कण्डेय जी से कि या था। मार्कण्डेयजी ने प्रजापति से मनुष्यों की  रक्षा करने वाले अति गोपनीय साधन जानने की  इच्छा जाहिर की तो उन्होंने बताया कि   देवी कवच ही एक  मात्र परम गोपनीय साधन है। इनके स्मरण से मनुष्यों का  उपकार हो जाता है। ब्रह्मï ने बताया कि  देवी की  नौ मूर्तियां हैं इन्हें ही नव दुर्गा कहा जाता है। चारिणी। दुर्गा का तीसरा स्वरूप चन्द्रघंटा के नाम से प्रसिद्ध है। चौथे स्वरूप को कुष्माडा कहते हैं। पांचवीं दुर्गा का नाम स्कंदमाता और छठा रूप कात्यायनी है। देवी का  सातवां नाम कालरात्रि और आठवां महागौरी है। नवी दुर्गा का  नाम सिद्धिदात्री है। अधीश्वरी हैं। पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं इसी से इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। नव दुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री का  वाहन वृषभ है। इनके  दाहिने हाथ में त्रिशूल तथा बाएं हाथ में कमल पुष्प सुशोभित होता है। पूर्व जन्म में शैलपुत्री दक्ष की पुत्री थी। उस समय इनका नाम सती था। इनका विवाह भगवान शिव से हुआ था। अनंत शक्तियों से शक्तिमान हैं शैल पुत्री। नवरात्रि के  प्रथम दिन इन्हीं की  पूजा एवं उपासना होती है। योगी अपनी योग साधना का  शुभारंभ करते हैं और अपने मन को  मूलाधार चक्र  में स्थित करते हैं। दूसरा स्वरूप ब्रह्मïचारिणी का  है। ब्रह्मïचारिणी में निहित है तप का आचरण। इस रूप में मां दुर्गा अपने दाएं हाथ में भाला एवं बाएं हाथ में कमंडल धारण करती हैं। ब्रह्मचारिणी भी हिमालय की  ही पुत्री हैं और इनका  भी विवाह भगवान शंकर से ही हुआ है। नवरात्रि के  दूसरे दिन इनकी  पूजा की  जाती है। ब्रह्मचारिणी की  पूजा अर्चना से अनंत फल मिलता है। मनुष्य में तप, संयम एवं सदाचार की वृद्धि होती है।  तीसरे दिन भगवती चंद्रघंटा की  पूजा का  विधान है। यह स्वरूप कल्याणकारी होता है। चन्द्रमा इनके  घंटा में स्थित है इसी कारण इनका नाम चंद्रघंटा है। दुर्गा चंद्र घंटा के  दस हाथ है। इनका वाहन सिंह है। हाथों में अस्त्र-शस्त्र सुसज्जित हैं। दानव इनसे सदैव डरते हैं। चंद्रघंटा की कृपा से पाप एवं बाधाएं दूर हो जाती हैं। इनकी मुद्रा सदैव युद्ध के  लिए उत्तेजित रहती है। इनकी साधना कल्याणकारी है। का  चौथा स्वरूप कुष्मांडा है। ब्रह्माण्ड  को उत्पन्न करने के  कारण ही इनका  नाम कुष्मांडा पड़ा। अपनी मुस्कान से ब्रह्माण्ड की  रचना करने वाली कुष्मांडा सृष्टि की  आदि शक्ति हैं। इनकी  आठ भुजाएं हैं इनका  भी वाहन सिंह है। इन्हें अष्टभुजा नाम से भी जाना जाता है। चौथे दिन इनकी  पूजा की जाती है। इस दिन साधक का  मन अनाहत चक्र  में स्थित होता है। कोई भी देवता इनके  तेज का  सामना नहीं कर सकता। इनकी उपासना से भक्तों के  रोग एवं शोक  नष्ट हो जाते हैं। का  पांचवां स्वरूप है  स्कंदमाता का । भगवान स्कन्द  यानी कार्तिकेय की  माता होने से इन्हें स्कन्द  माता के  नाम से जाना जाता है। नवरात्रि के  पांचवें दिन इनकी उपासना पूजा की  जाती है। इस दिन साधक का  मन विशुद्ध चक्र  में अवस्थित होता है। स्कन्द  माता देवी की  चार भुजाएं हैं। दाहिनी तरफ की  एक  भुजा से ये पुत्र स्कन्द को    गोद में पकड़े हुए होती हैं। सिंह वाहन है स्कन्द माता का। इनकी  उपासना से समस्त इच्छाएं पूर्ण होती हैं। का  छठा स्वरूप है कात्यायनी। देवताओं का कार्य सिद्ध  करने के  लिए महर्षि कात्यायन के  आश्रम में प्रकट हुई और महर्षि ने इन्हें अपनी कन्या मान लिया। इसलिए कात्यायनी नाम से प्रसिद्ध हुई। महिषासुर का  विनाश करने वाली मां कात्यायनी ही हैं। ब्रह्म की  अधिष्ठïती देवी हैं। गोपियों ने कृष्ण को  पाने के  लिए इन्हीं की  पूजा की थी। चार भुजाओं में दाहिने तरफ की  दोनों भुजाओं में एक  वर तथा दूसरी अभय मुद्रा में होती है। इनका  स्वरूप अत्यन्त अलौकिक  है। इनका वाहन सिंह है। छठे दिन साधक  का मन आज्ञा चक्र में होता है। इनकि  पूजा से अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों फलों कि  प्राप्ति होती है। का  सातवां स्वरूप कालरात्रि का  है। नवरात्रि के  सातवें दिन इनकी   पूजा होती है। इनका  रंग काला है। त्रिनेत्रधारी हैं। गले में अद्भुत चमकीली माला धारण करती हैं। इनका वाहन गधा है। कालरात्रि को  चार भुजाएं हैं। स्वरूप भयानक  पर शुभ फल देने वाला है। कालरात्रि दुष्टों का  विनाश करती हैं। इनकी कृपा से मनुष्य भय मुक्त रहता है। का  आठवां स्वरूप महागौरी का  है। इनके  वस्त्र एवं आभूषण श्वेत हैं। वाहन वृषभ है। चार भुजाएं हैं और दिव्य स्वरूप है। कठोर तपस्या में इनका शरीर काला हो गया था। तब भगवान शिव ने गंगा जल से धोया। तब उनका शरीर गोरा हो गया और इनका  नाम महागौरी पड़ गया। इनकी कृपा से अलौकिक  सिद्धियों की  प्राप्ति होती है। इनकी  पूजा आठवें दिन होती है। के  नवें दिन दुर्गा के  नवें स्वरूप सिद्धिदात्री की  पूजा होती है। ये सभी प्रकार की  सिद्धियों को  देने वाली हैं। मार्कण्डेय पुराण में भी इसका  उल्लेख मिलता है। भगवान शिव ने इनकी कृपा  से भी सिद्धियां प्राप्त की  थी। वाहन सिंह है। चार भुजाएं हैं मां सिद्धिदात्री को मल पुष्प पर विराजमान मां की  पूजा से सभी कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। के  माध्यम से मानव की  हर कामना को पूरा करती हैं। जो इनकी शरण में होता है उनका कोई अमंगल नहीं होता है। देवी का  भक्ति पूर्वक  स्मरण करने से कल्याण होता है। देवी ही शक्ति हैं। इनके बिना कोई भी काम संभव नहीं होता है।

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