Saturday, January 26, 2019





अटल विश्वास ही है अक्षयवट
प्रयागराज में दर्शन करने लगे श्रद्धालु
राजमणि त्रिपाठी
 गंगा ,यमुना और सरस्वती के संगम पर इस समय आस्था और धर्म की धारा बह रही है। माघ महीने में सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करते ही पावन नगरी प्रयागराज में देवता आकर निवास करने लगते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है कि माघ मकर रवि गति जब होई तीरथपतिहिं आव सब कोई। इस वर्ष तो आस्था और विश्वास की नगरी प्रयाग में अर्द्ध कुम्भ चल रहा है। जिसे विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक मानव मेला भी कहा जाता है। इस बार इस धार्मिक महोत्सव में सबसे बड़ी बात यह है कि श्रद्धालु अक्षयवट का दर्शन करके अपनी धार्मिक यात्रा को पूरा कर सकेंगे।
 अकबर के शासन काल से ही अक्षयवट का दर्शन नहीं हो पा रहा था। कारण था कि अकबर ने जब  किला का निर्माण कराया तो अक्षयवट सहित मंदिर भी किले की परिधि में आ गए और श्रद्धालु दर्शन से वंचित हो गए। एक लम्बे समय के बाद उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 10 जनवरी, 2019 को   इस वटवृक्ष को हिन्दू श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया। यही नहीं  सरस्वती कूप में देवी सरस्वती की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा भी की। अकबर नई गंगा जमुनी तहजीब को परवान चढ़ाना चाहता था शायद इसी लिए  अकबर ने वहां एक किला बनाने का निर्णय लिया। किला बना, पर हिंदुओं के लिए सर्वाधिक पवित्र  अक्षयवट वृक्ष और कई मंदिर  इस किले की परिधि में आ गए।  अकबर ने मंदिरों को  नष्ट नहीं किया। बाहर से अक्षयवट के तने की पूजा श्रद्धालु करते रहे।  तभी से अक्षयवट वृक्ष किले में हिंदुओं की पहुंच से दूर हो गया था पर अर्द्ध कुम्भ का यह अवसर उनके लिए वरदान साबित हुआ। उत्तरप्रदेश सरकार ने इसे दर्शन के लिए खोल दिया।   
बटु बिस्वास अचल निज धरमा। तीरथराज समाज सुकरमा॥
सबहि सुलभ सब दिन सब देसा। सेवत सादर समन कलेसा॥
 धर्म में जो अटल विश्वास है, वह अक्षयवट है और शुभ कर्म ही उस तीर्थराज का समाज  है। वह संत समाज रूपी प्रयागराज सब देशों में, सब समय सभी को सहज ही में प्राप्त हो सकता है और आदरपूर्वक सेवन करने से दुखों को नष्ट करने वाला है। तीर्थराज अलौकिक और अकथनीय है एवं तत्काल फल देने वाला है, उसका प्रभाव प्रत्यक्ष है। जो मनुष्य इस संत समाज रूपी तीर्थराज का प्रभाव प्रसन्न मन से सुनते और समझते हैं और फिर अत्यन्त प्रेमपूर्वक इसमें गोते लगाते हैं, वे इस शरीर के रहते ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष- चारों फल पा जाते हैं। इस तीर्थराज में स्नान का फल तत्काल ऐसा देखने में आता है। यह सुनकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि सत्संग की महिमा छिपी नहीं है। वेदों में और लोक में इनकी प्राप्ति का दूसरा कोई उपाय नहीं है। सत्संग के बिना विवेक नहीं होता और श्री राम की कृपा के बिना वह सत्संग सहज में मिलता नहीं। सत्संगति आनंद और कल्याण की जड़ है। सत्संग की प्राप्ति ही फल है और सब साधन तो फूल है।
 जहां तक अक्षयवट का सवाल है इसका वर्णन पुराणों और प्रमुख धार्मिक ग्रंथो में मिलता है। मत्स्य पुराण के अनुसार  प्रलय होने बाद और युगों की समाप्ति पर भी महत्वपूर्ण है यह वटवृक्ष खड़ा रहता है। अक्षयवट प्रयागराज में यमुना के तट पर स्थित है। बताया जाता है कि विष्णु इस वृक्ष पर बाल रूप में रहते हैं और प्रलय के बाद नई सृष्टि की रचना करते हैं। अक्षयवट के नाम से जाने  जाने वाले इस वट का कभी क्षय नही होता है। अब इसी वट को उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोल दिया है। यह भी कहा जाता है कि मुग़ल शासकों ने इस वट को नष्ट करने की बड़ी कोशिश की पर सफल नहीं हो पाए। परिणाम स्वरुप इसे हिन्दुओं से दूर कर दिया गया लेकिन आज भी यह अक्षयवट सनातन धर्मावलम्बियों में नवीन आशा का संचार करता रहता है। श्रद्धालुओं और संतों की लगातार मांग के बाद भी किसी सरकार ने इस वृक्ष के दर्शन के लिए कोई कोशिश नहीं की। अंतत; उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रयासों से यह संभव हो गया।
 पौराणिक कथाओं और रामचरित मानस के अनुसार प्रयाग में स्नान के बाद अक्षय वट का पूजन एवं दर्शन जरूर करना चाहिए। इसके दर्शन के बाद ही प्रयागराज की यात्रा पूरी होती है। मोक्ष प्राप्ति के लिए लोग इस वट के दर्शन करने आते है। अक्षय वट वृक्ष के नीचे से ही अदृश्य सरस्वती नदी के बहने की भी परिकल्पना की जाती है। यह भी वर्णित है कि ब्रह्मा  जी ने प्रयाग ( वटवृक्ष के नीचे) पहला यज्ञ किया था। इसमें समस्त  देवी-देवताओं का आह्वान किया गया था।
 फिलहाल अक्षयवट प्रयागराज की धार्मिक यात्रा की कहानी आज भी कह रहा है। लोग दूर से ही इसका दर्शन कराकर अपने को धन्य मानते हैं। बहरहाल आस्था का प्रतीक यह अक्षयवट  आज भी विशालता को बनाए हुए लहलहा रहा है। वट वृक्ष के नजदीक जाने पर आज भी लगता  है कि यह वट बूढ़ा नहीं है और लोगों की आस्था का केंद्र बना है।

Saturday, October 27, 2018

कार्तिक मास में तुलसी पूजा और विष्णु आराधना फलदायी

कार्तिक मास में तुलसी पूजा और विष्णु आराधना फलदायी
राजमणि त्रिपाठी
कल्याण। धार्मिक दृष्टि से तुलसी का विशेष महत्वपूर्ण स्थान है। विशेषकर कार्तिक महीने में तुलसी की पूजा और तुलसी विवाह की परंपरा सदियों से चली आ रही है। कार्तिक मास शुरू हो गया है। कार्तिक मास में तुलसी पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। कहते हैं तुलसी की पूजा करने से सभी  मनोकामनायें   पूरी हो जाती हैं। शास्त्रों में चातुर्मास में आने वाले कार्तिक मास को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष देने वाला माना गया है। गीता में उल्लेख मिलता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहा है कि पौधों में तुलसी ,मासों में कार्तिक , दिवसों में एकादशी और तीर्थों में द्वारिका मुझे प्रिय है।
 तुलसी के जन्म के विषय में अनेक पौराणिक कथाएं मिलती हैं। इसमें जालंधर राक्षस तथा उसकी पत्नी वृंदा की कथा प्रमुख मानी गई है। पद्मपुराण में जालंधर तथा वृंदा की कथा दी गई है। बाद में वृंदा तुलसी रुप में जन्म लेकर भगवान विष्णु की प्रिय सेविका बनी। अपने सतीत्व तथा पतिव्रत धर्म के कारण ही वृंदा विष्णुप्रिया कहलाई। शालिग्राम रुप में भगवान विष्णु तुलसी जी के चरणों में रहते हैं। उनके मस्तक पर तुलसीदल चढ़ता है।
कार्तिक माह में तुलसी पूजन करने का विशेष महत्व बताया गया है। पुराणों एवं हिन्दू ग्रंथों में कहा गया है कि  घर में सदैव शुभ कर्म , सदैव सुख शान्ति के लिए तुलसी की आराधना अवश्य करनी चाहिए।
 कार्तिक मास में तुलसी के समीप दीपक जलाने से मनुष्य अनंत पुण्य का भागी बनता है।  तुलसी की पूजा करने वाले के घर मां लक्ष्मी का हमेशा निवास होता है। तुलसी में साक्षात लक्ष्मी का निवास माना गया है।  कार्तिक मास में तुलसी पूजन से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
तुलसी का प्रतिदिन दर्शन करना पापनाशक बताया गया है तथा पूजन करना मोक्षदायक। देवपूजा और श्राद्धकर्म में तुलसी आवश्यक है। तुलसी दल से पूजा करने से व्रत, यज्ञ, जप, होम, हवन करने का पुण्य प्राप्त होता है। कहते हैं भगवान श्रीकृष्ण को तुलसी अत्यंत प्रिय है। तुलसी को जल अर्पित करते समय  मंत्र जाप विशेष फलदायी होता है।
महाप्रसाद जननी, सर्व सौभाग्यवर्धिनी
आधि व्याधि हरा नित्यं, तुलसी त्वं नमोस्तुते।।
बहरहाल कार्तिक मास शुरू होते ही हर घरों में तुलसी की पूजा होने के साथ ही भगवान नारायण ,गोविन्द की पूजा होने लगी है।  कार्तिक मास में दोनों एकादशी का विशेष महत्व होता है।  एकादशी का व्रत करने से समस्त पापों का विनाश हो जाता है लेकिन ध्यान रहे इस दिन तुलसी के पत्ते को नहीं तोड़ना चाहिए। कार्तिक मास में महिलाएं ब्रह्म मुहूर्त में ही गंगा या फिर कुएं पर स्नान करती हैं जिसे प्रात स्नान कहते हैं। स्नान के बाद ुलसी को जल अर्पित कराती हैं और भगवान विष्णु की आराधना कराती हैं।  बहरहाल कार्तिक मास में विष्णु उपासना और तुलसी पूजा फलदायी और पापों का विनाश होता है।    

Sunday, September 9, 2018

आस्था का केंद्र राजराजेश्वरी दुर्गा मंदिर महरछा


राजमणि त्रिपाठी
 आदि शक्ति हैं माँ दुर्गा । माँ भगवती के अनेक रूप और नाम हैं । भक्त इन्हीं स्वरूपों  के विभिन्न नामों से पूजा, अर्चना करते हैं । माँ भगवती का एक नाम राजराजेश्वरी भी है। इनका स्वरूप मोहक एवं  आकर्षक है। इलाहाबाद जिले  में वरूणा तट पर स्तिथ महरछा, रध्ईपुर गांव  में राजराजेश्वरी दुर्गा मां का विशाल एवं भव्य मंदिर है,जो भक्तों की आस्था का केंद्र बन गया है।
 राजराजेश्वरी देवी माँ का दर्शन करने के लिए  23 सीढियां चढ़नी पडती हैं । माँ राजराजेश्वरी सिंह पर सवार हैं और आठ भुजाओं वाली हैं। इनकी प्रतिमा अत्यंत मनमोहक और आकर्षक है। प्रतिमा करीब 9  कुन्तल की है। रात में  मंदिर की सजावट भक्तों का मन मोह लेती है। इनके दर्शन के  लिए  भक्त दूर दूर से आते हैं। अब माँ राजराजेश्वरी का यह मंदिर भक्तों की आस्था और विश्वास का केंद्र बन गया है। यहां  नवरात्र और हर मंगलवार को  भक्तों की अपार भीड़ होती है। वैसे रोज सुबह से ही दर्शनाथियों का आना जाना लगा रहता है।
पंडित ठाकुर प्रसाद चेरिटेबल न्यास द्वारा संचालित यह मंदिर करीब 55 फिट ऊँचा है। पूरी तरह मार्बल से निर्मित इस मंदिर के संस्थापक हैं राजमणि  त्रिपाठी।  मंदिर का निर्माण तीन वर्षों के अथक प्रयास से माँ दुर्गा की कृपा से हुआ । मंदिर का एक अपना इतिहास है। इस मंदिर के निर्माण के लिए जगह ही नहीं मिल पा रही थी। करीब 7 वर्षों की कोशिश के बाद जगह मिली और मंदिर का निर्माण हो गया। बताते हैं कि राजमणी त्रिपाठी का यह सपना उनके ही सतत प्रयास का परिणाम है। इस मंदिर के निर्माण में उन्होंने "तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा"  की तर्ज पर अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। राजमणि त्रिपाठी का कहना है कि माँ की कृपा और आशीर्वाद से ही मंदिर का निर्माण संभव हो पाया। बहरहाल मंदिर की भव्यता को देखकर  भक्त मनमुग्ध हो जाते हैं। माँ के इस पवित्र धाम में नियमित पूजा ,अर्चना होती है। पूजा के लिए  पुजारियों की नियुक्ति की गई है। प्रतिदिनं सुबह  शाम माँ भगवती की आरती होती है। दोपहर में भोग लगता है। पुजारी शशिकांत पांडे मां की सेवा मंदिर की देखरेख व्यवस्थित तरीके से करते हैं। मंगलवार की मध्यान्ह आरती आकर्षण का केंद्र होती है। भक्त माँ के दरबार में विशेष  धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
  न्यास बोर्ड के अलावा मंदिर की  देखरेख के लिए प्रबंध समिति है। प्रबंध समिति के सदस्य अहक नारायण, महेंद्र शुक्ल, विजयशंकर तिवारी ,सुशील कुमार त्रिपाठी , सुधीर  ,निर्मल और अनिल त्रिपाठी उर्फ़  गोरे, दशरथ शुक्ल , आनंद शुक्ल और पिंटू शुक्ल   देखरेख में तत्पर रहते हैं। मंदिर प्रशासक के रूप में सुधीर त्रिपाठी  कार्यरत हैं । मंगलवार मेले के दिन विशेष  व्यवस्था की जाती है । शनिवार को श्री रामचरित मानस के सुंदरकांड का पाठ होता है। भक्तों का कहना है कि माँ राजराजेश्वरी हर लोगों को मनवांछित फल देती हैं । अब लोग यहां मन्नत मानते हैं और जगदम्बा उनकी मुराद पूरी करती हैं। भक्तों में महिलाएं ,पुरूष, बच्चे ,बुजुर्ग सभी का समावेश होता है। मुराद पूरी होने पर भक्त गाजे बाजे और निशान के साथ माँ राजराजेश्वरी के दर्शन के लिए आते हैं। यही नहीं लोग अपनी मन्नत के अनुसार मंदिर में अनेक धार्मिक अनुष्ठान करवाते हैं।
 माँ भगवती के इस मंदिर में चैत और क्वार के अलावा स्थापना दिवस को विशाल भंडारा का आयोजन किया जाता है। स्थापना दिवस प्रत्येक २ मार्च को उत्साह और हर्षोल्लास से मनाया जाता है। मंदिर में माँ दुर्गा की प्राण प्रतिष्ठा का यह चौथा वर्ष है  प्राण प्रतिष्ठा २ मार्च १९१५ को हुई थी।  इस वर्ष भी २ मार्च को स्थापना दिवस मनाया जाएगा। कोई भी भक्त आस्था और तन ,मन और धन से भंडारा में शामिल हो सकता है।  भक्तों की हर मुराद पूरा करने वाली माँ राजराजेश्वरी दुर्गा माता  आस्था और विश्वास का केंद्र बन गई हैं । दुर्गा शक्तिपीठ रधईपुर के नाम से विख्यात यह पावन और पवित्र स्थल गांव  के धर्ममय वातावरण की कहानी का गवाह बन गया है।


Wednesday, November 20, 2013

उत्पन्ना एकादशी

उत्पन्ना एकादशी मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष
सूत जी ने शौनक आदि ऋषियों को एकादशी तिथि का नाम और उसके महात्म्य हो सुनाया था। उन्होंने सभी एकादशियों के नाम भी बताए और कहा कि एकादशी नारायण को प्रिय है। भगवान के अंग से उत्पन्न होने के कारण एकादशी का नाम उत्पन्ना है। यह पौष (मार्गशीर्ष) के कृष्ण पक्ष में अवतरित हुई। एकादशियों का व्रत एवं उद्यापन करने में समर्थ न होने पर मानव द्वारा केवल उसका संकीर्तन करने से पुण्य प्राप्त हो जाता है। सूत जी ने शौनक ऋषियों से कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने सबसे पहले पांडवों को एकादशी की विधि एवं उसकी महिमा को बताया था। अर्जुन ने पूछा था कि हे जनार्दन, मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की एकादशी के व्रत का क्या पुण्य है।
भगवान वासुदेव ने कहा, हेमंत ऋतु में मार्गशीर्ष महीने के आगमन पर कृष्ण एवं शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करना चाहिए। दशमी के दिन रात्रि में दातून करने के बाद भोजन आदि नहीं करना चाहिए। प्रात: काल संकल्प लेना चाहिए। उन्होंने अर्जुन से कहा, दोपहर में शुद्ध मन से स्नान करें। नदी, तलाव आदि में स्नान करना उत्तम है। इनके अभाव में कुएं पर स्नान करना श्रेष्ठ है। मनुष्य को स्नान से पूर्व मृत्तिका स्नान करना चाहिए। हे विष्णुकांत पूर्व जन्म के मेरे संचित पाप विनष्ट कर दीजिए। पापों के विनष्ट होने से मोक्ष मिल जाएगा। ऐसा कह कर भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए।
एकादशी व्रत के दिन पतित, चोर पाखंडी, झूठ बोलने वाले, देवता और ब्राह्मण की निंदा करने वाले मनुष्यों से बात नहीं करनी चाहिए। दुष्ट आचरण करने वाले, माता, भगिनी आदि से भोग करने वाले, देवता का द्रव्य ग्रहण करने वाले, दूसरे का धन अपहरण करने वाले से बातचीत नहीं करना चाहिए। यदि इनसे भेंट हो जाए, तो गोविंद का पूजन करना चाहिए। उन्होंने अर्जुन से कहा, एकादशी के दिन परनिंदा एवं स्त्री संग न रहें। भगवान का स्मरण दिन रात्रि करना चाहिए। रात्रि में जागरण करना चाहिए। ब्राह्मण को दान देकर क्षमा याचना करना चाहिए। दोनों पक्षों की एकादशियों को एक समान मानना चाहिए। इस प्रकार व्रत करने से जो पुण्य होता है उसे श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बताया।
फल
श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा, शंखोद्वार नामक क्षेत्र में स्नान करने से मनुष्य को जो फल मिलता है वह एकादशी व्रत के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं है। संक्रांति में दान, ग्रहण के समय कुरुक्षेत्र में स्नान करने से जो फल मिलता है, वह सब पुण्य एकादशी व्रत करने वाले मनुष्य को प्राप्त होता है। अश्वमेघ यज्ञ की तुलना में सौ गुना फल एकादशी व्रत से होता है। घर में श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन कराने से जो पुण्य मिलता है, उससे ज्यादा एकादशी व्रत से मिलता है। रात्रि में भोजन करना और दिन में एक बार भोजन करने से आधा फल मिलता है। अन्न दान से पितर और देवता तृप्त होते हैं। दिन में एक बार भोजन करना, रात्रि में भोजन करना और उपवास इन तीन प्रकार के व्रतों में से कोई न कोई व्रत करना चाहिए। संसार में भयमुक्त डरे हुए व्यक्ति को एकादशी व्रत करना चाहिए। एकादशी को भोजन न करने का विधान है। एकादशी व्रत के समान हजार यज्ञ भी नहीं हैं। इस प्रकार वासुदेव ने अर्जुन को एकादशी का पुण्य बताया था।
अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा, हे वसुदेव आपने एकादशी को सब तिथियों में श्रेष्ठ क्यों कहा? कृष्ण उन्हें बताते हैं। देवताओं को डराने वाला मुरु नामक एक अति अद्भुत दैत्य था। उसने इंद्र को जीत लिया था। इंद्र ने यह वृत्तांत महादेव से बताया। देवताओं के भूमि पर विचरण करने की कथा सुनकर त्रिनेत्रधारी ने कहा, हम सब जगत के स्वामी विष्णु के पास चलते हैं। वे ही हमारा कार्य कर सकते हैं। फिर शिव के नेतृत्व में समस्त देव भगवान विष्णु के उस स्थल पर गए, जहां वह सो रहे थे। पुंडरीकाक्ष को शयनकक्ष में सोते देख कर महादेव उनकी स्तुति करने लगे। हे जगत के स्वामी देवताओं की रक्षा करें। सर्व व्यापी त्रिभुवन पति देव आप ही देवों की रक्षा कर सकते हैं। हे लक्ष्मीकांत आप ही इस सृष्टि के स्वामी हैं। शिव की स्तुति को सुन कर भक्त वत्सल्य विष्णु ने कहा, ऐसा कौन सा दैत्य है, जिसने देवताओं को जीत लिया है। उसका स्थान एवं नाम क्या है। फिर इंद्र ने भगवान विष्णु को मुरु का नाम एवं स्थान बताया।
हे लक्ष्मीपते, नाडीजंघ नाम का राक्षस था। उसका पुत्र मुरु नामक बड़ा असुर है। चंद्रावती उसकी नगरी थी। वहीं से शासन करता हुआ वह दैत्य देवताओं को स्वर्ग से निकाल कर उसे अपने अधीन कर लिया। सूर्य बन कर वह तप रहा है। वह ही स्वयं सब देवता बन गया है। उससे हमारी रक्षा करें। विष्णु ने फिर उस दैत्य को मारने का आश्वासन इंद्र को दिया। फिर विष्णु के पीछे- पीछे समस्त देवता चंद्रावती पुरी को गए। देवताओं ने गरजना शुरू किया, लेकिन असुरों के सामने सब देवता रणभूमि छोड़कर भाग गए। फिर भगवान विष्णु पर दैत्य अनेक शस्त्रों से प्रहार करने लगे। भगवान ने असुरों को बाणों से वेध दिया। राक्षस मारे गए, लेकिन मुरु दैत्य युद्ध करता रहा। भगवान के शस्त्र काम नहीं कर रहे थे। फिर वह बाहु युद्ध किए। फिर थक कर भगवान विष्णु बद्रीका आश्रम चले गए। वहां हेमवती नामक गुफा में शयन करने गए, लेकिन वह दैत्य गुफा में घुस गया। विष्णु को सोते हुए देख कर वह असुर विष्णु को मारने के लिए मन में विचार करने लगा। उस वक्त विष्णु के शरीर से एक तेजस्विनी कन्या उत्पन्न हुई। उस देवी ने दैत्य से युद्ध किया और उसके सिर को काट कर यमलोक भेज दिया। तत्पश्चात शेष असुर भय से पाताल चले गए। फिर भगवान विष्णु उठ कर मारे हुए दैत्य को देखा। जिस असुर को देवता भी न मार सके उसे किसने मारा। कन्या ने कहा, आपके अंश से उत्पन्न हुई हूं और मेरे द्वारा ही इस असुर का बध हुआ है। आपको सोया देख कर दैत्य आपको मारने के लिए उद्यत था, इसलिए मैंने इसका संहार किया।
विष्णु ने कहा, हे अनघे मैं तुमसे प्रसन्न हूं। जो भी वर मांगना हो मांग लो। फिर तेजस्विनी कन्या ने कहा, यदि वर देना है, तो वह वर दीजिए जिससे मैं व्रत करने वालों का उद्धार कर सकूं। उपवास का जो फल मिलता है उसका आधा फल रात्रि में भोजन करने वाले को प्राप्त हो। जो मेरा व्रत करे उसे वैकुंठ धाम मिले और अनेक तरह के भोगों का उपयोग करे। जो व्यक्ति हमारे दिन उपवास, रात्रि या दिन में एक बार भोजन करे उसे धन, धर्म और मोक्ष प्रदान करें। भगवान ने कहा हे कल्याणी, जो तुमने कहा वही व्रत करने वालों को प्राप्त होगा। तुम एकादशी को उत्पन्न हुई है अत: इस एकादशी का नाम तुम्हारा ही होगा। तीज अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी तिथियां मुझे प्रिय हैं, परंतु इन सब में मुझे एकादशी अति प्रिय है। एकादशी का पुण्य सब तीर्थों से अधिक है। जो एकादशी का व्रत करेगा उसके विघ्नों को हर लूंगा और उन्हें सिद्धि प्रदान करूंगा। जो इसका व्रत करेगा उसके शत्रुओं का विनाश होगा। ऐसा वर देकर भगवान विष्णु अंतर्धान हो गए। एकादशी तिथि हृष्टपुष्ट हो गई।
इस प्रकार भगवान कृष्ण ने पांडवों को एकादशी उत्पत्ति की कथा बताई। यह एकादशी सब पापों का नाश करने वाली है। यह एक ही तिथि है जो समस्त लोक में प्रसिद्ध है। शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष की एकादशी दोनों ही श्रेष्ठ हैं। इनमें द्वादशी युक्त सबसे उत्तम है। एकादशी का व्रत करने वालों को परम धाम की प्राप्ति होती है। जो एकादशी का महात्म्य पढ़ते हैं, उन्हें अश्वमेघ यज्ञ के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। एकादशी का व्रत निराहार करना उत्तम है। जो विष्णु भक्त विष्णु कथा को रात दिन सुनते हैं, वे विष्णु लोक में निवास करते हैं। एकादशी महात्म्य का थोड़ा अंश भी सुनने में समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। अत: मनुष्य को अपने कल्याण के लिए एकादशी व्रत करना चाहिए। सर्वप्रथम हेमंत ऋतु में मार्गशीर्ष (अगहन) कृष्ण एकादशी से इस व्रत को प्रारंभ किया जाता है।
कहा जाता है कि एकादशी का जन्म भगवान की रक्षा के लिए हुआ था। साल के 12 महीने में 24 एकादशी होती हैं। इनके जैसे नाम हैं वैसे ही गुण हैं। उत्पन्ना, मोक्षदा, सफला, पुत्रदा, षटतिला, जया, विजया, आमलकी, पापमोचनी, कामदा, बरूथिनी, मोहिनी, अपरा, निर्जला, योगिनी, देवशयनी, पुत्रदा, पवित्रा, अजा, परिवर्तिनी, इंदिरा, पांपाकुशा, रमा और देवशयनी। इसके अलावा पद्मिनी और परमा मलमास माह में होती हैं। इन दोनों को मिलाकर कुल 26 एकादशी होती हैं।

Tuesday, February 26, 2013

विश्वास का प्रतीक टिटवाला का श्रीगणेश मंदिर


ठाणे जिले के  धार्मिक  स्थलों में एक  है टिटवाला। टिटवाला महागणपति की नगरी के रूप में विख्यात है। टिटवाला के  गणपति में प्राचीन काल से लोगों की  आस्था है। करीब साढ़े तीन फुट ऊंची प्रतिमा। चार भुजाएं। हाथों में परशु रुद्राक्ष माला, गदा एवं मोदक । आकर्षक  एवं मनमोहक · परिधान। यह स्वरूप है टिटवाला के सिद्धिविनाय· महागणपति का। सभी कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। सभी क्लेश नष्ट हो जाते हैं। मन को शांति मिलती है। आस्था, श्रद्धा एवं विश्वास का प्रतीक  बन चुका है टिटवाला का श्रीगणेश मंदिर। विघ्नहर्ता के दर्शन के  लिए हमेशा भक्तों का जमावड़ा रहता है मंदिर परिसर में।
महाराष्ट्र के ठाणे जिले के कल्याण तालुका में स्थित टिटवाला का गणेश मंदिर ऐतिहासिक  एवं पौराणिक  दृष्टि से काफी महत्व रखता है। यही था कण्व ऋषि का आश्रम। दंडकारण्य के इस क्षेत्र में शकुंतला एवं दुष्यंत का विवाह हुआ था। ऐसा माना जाता है कि राजा दुष्यंत एक  बार इस क्षेत्र में शिकार करने आए थे, तब कण्व ऋषि की मानस पुत्री शकुंतला के वे स्वयं शिकार हो गए। बाद में कण्व ऋषि ने दुष्यंत एवं शकुंतला का गंधर्व विवाह कर दिया। विवाह के बाद दुष्यंत लौट गए पर वह दुर्वासा के श्राप के कारण शकुंतला को भूल गए। शकुंतला संतप्त हो गई। शकुंतला को दुखी देख·र कण्व ने विघ्नहर्ता गणेश की  पूजा-अर्चना करने को कहा। कण्व ऋषि एवं शकुंतला ने सिद्धिविनाय की  प्रतिमा बना दी और शकुंतला ने प्रथमेश की पूजा शुरू कर दी। शकुंतला गणपति की आराधना में हमेशा लगी रही। अंतत: विघ्नहर्ता ने प्रसन्न होकर दुर्वासा के शाप को विनष्ट कर दिया और शकुंतला एवं दुष्यंत का फिर मिलन हो गया। तभी से टिटवाला भक्तों की आस्था का प्रतीक  बन गया।
यह भी कहा जाता है कि नवी सदी की इसी प्रतिमा की पूजा शकुंतला ने की थी। बाद में पेशवा माधवराव के शासन काल में सूखा पड़ा, तो यहां स्थित सरोवर की खुदाई की गई। यह प्रतिमा उसी सरोवर में मिली, जिसे पेशवा सरदार रामचंद्र महेंदले ने प्राप्त किया था  और फिर प्रतिमा की प्रतिष्ठा की। तभी से यहां गणपति की पूजा-आराधना होनी लगी, जो आज तक  जारी है। वर्तमान समय में जोशी परिवार इस मंदिर की देखरेख करते हुए पूजा-अर्चना करता है।
टिटवाला का सिद्धिविनाय महागणपति भक्तों के आस्था का केंद्र बन गया है। मंदिर में अंगारिका चतुर्थी को भक्तों का जन सैलाब उमड़ पड़ता है। गणेश चतुर्थी को यहां लंबी कतारें देखने को  मिलती हैं। भक्तगण चार बजे सुबह से पहुंचना शुरू कर देते हैं और गणपति बप्पा मोर्या की हर्ष ध्वनि से वातावरण गणेशमय बन जाता है।
ऐसी धारणा भी है कि महागणपति की विश्वास से पूजा करने पर विवाह के इच्छुक  लोगों की शादी जल्द हो जाती है। पति-पत्नी के बीच द्वंद्व समाप्त हो जाता है। पुत्र की इच्छा  रखने वाले को पुत्र की प्राप्ति हो जाती है। ऐसे भगवान गणेश की पूजा करने के लिए गणेश चतुर्थी को भक्तों की भीड़ ज्यादा हो जाती है। टिटवाला के गणपति भक्तों की मनोकामना पूर्ण करते हैं ऐसा भक्तों को विश्वास है और गणपति उनके विश्वास को टूटने भी नहीं देते हैं।

Sunday, January 1, 2012

स्वागतम न्यू ईयर


 बीती ताहि बिसार दे आगे की  सुधि लेहु

नया साल कुछ लेकर आता है और पुराना वर्ष कुछ देकर जाता है। कुछ साल ऐसे भी होते हैं जो लोगों के  लिए हमेशा के  लिए यादगार बन जाते हैं। ये यादें खट्टी और मिठी दोनों हो सकती हैं। ऐसा ही रहा होगा कुछ लोगों के  लिए 2011। कहा गया है कि   बीती ताहि बिसार दे आगे की  सुधि लेहु। ऐसा ही सोच कर हम सब को  नए साल का  स्वागत करना  चाहिए। जिस तरह मेहमान के आने पर हम उसका  उत्साह एवं गर्मजोशी से स्वागत करते हैं और जाने के  समय उतने ही उत्साह एवं उमंग से उसकी  विदाई करते हैं उसी तरह ही उत्साह एवं जोश से हम सब को जाने वाले वर्ष की  विदाई और आने वाले साल का  स्वागत करना चाहिए। फिलहाल नए वर्ष की अगवानी हमने  उत्साह से किया।सबको न या साल मंगलमय हो यही हमारी  शुभकामना। रामचरित मानस में गोस्वामी ने लिखा है—
सुनहु भरत भावी प्रबल विलखि कहेउ मुनिनाथ

हानि, लाभ, जीवन, मरण, यश अपयश विधि हाथ

लोगों की  ऐसी धारणा उन्हें एवं उनके  परिवार को  धर्म के  प्रति आस्थावान बनाती है।उनका  यही मानना है कि जन कल्याण की भावना से किया गया कार्य सदैव सराहनीय एवं अच्छा होता है। हम नए साल में नए विचारों एवं नए जोश से आगे बढ़ें। ऐसा सोच कर हम  अप ने संकल्प को आगे बढ़ाये निश्चित रू प से सफलता मिलेगी।

Wednesday, December 14, 2011

विंध्यवासिनी

विंध्याचल प्राचीन काल  से ऋषि मुनियों की  तपस्थली रही है। उत्तर प्रदेश के  मिर्जापुर में स्थित विंध्याचल में ही निवास करती हैं मां विंध्यवासिनी। विंध्यवासिनी एक  शक्ति पीठ के रूप में जानी जाती हैं। यह शक्ति पीठ हमेशा से भक्तों की  आस्था  का  केन्द्र बना हुआ है। तांत्रिक  दृष्टि से भी दुर्लभ स्थान माना जाता रहा है विंध्याचल क्योंकी यहां तीन देवियों का त्रिकोण है। ये तीन शक्तियां हैं- महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती।
विंध्यवासिनी पूर्वांचल की  सर्वाधिक  प्रसिद्ध देवी हैं। मिर्जापुर जिले के  अंतर्गत विंध्याचल रेलवे स्टेशन के समीप ही गंगा के  तट पर विंध्यवासिनी देवी का  मंदिर स्थित है।
पुराणों में मां विंध्यवासिनी की  अनेक कथाएं मिलती हैं। मार्कडेय पुराण के  अनुसार देवी ने स्वयं कहा है कि  जब शुंभ-निशुंभ नाम· महादैत्य उत्पन्न होंगे, तब मैं नंद गोप के  यहां उनकी पत्नी यशोदा के  गर्भ से उत्पन्न होकर विंध्याचल पर्वत पर जाकर रहूंगी और उन दोनों असुरों का  वध करूंगी। श्रीमद्भागवत महापुराण में भी उल्लेख मिलता है कि  वसुदेव कंस के  भय से अपनी पत्नी देवकी   के  आठवें गर्भ से उत्पन्न श्रीकष्ण को  रातोंरात गोकुल  में नंद गोप के  यहां पहुंचाकर वहां उसी समय उनकी पत्नी यशोदा के गर्भ से पैदा हुई कन्या को लेकर मथुरा के कारागार में वापस लौट आए। कंस जब उस कन्या को  पत्थर पर पटक कर मारना चाहता था तभी वह अद्भुत कन्या उसके  हाथों से निकल कर आकाश गामिनी हो जाती है और कंस के  वध की भविष्यवाणी कर के  विंध्याचल पर्वत पर आकर विराजमान हो गईं। एक  अन्य कथा में यह कहा गया है कि क्षीर सागर के  तट पर जब स्वायंभू मनु ने देवी की आराधना करते हुए सौ वर्षों तक  घोर तपस्या की  तब देवी ने प्रकट होकर उन्हें मनोवांछित वर प्रदान किए तथा भगवती स्वयं विंध्याचल पर स्थित होकर विंध्यवासिनी कहलाईं।
महाकाली की  भी उत्पत्ति की  एक  अलग कहानी है। श्री यंत्र पर बसे विंध्य धाम के  दक्षिण कोण में काली   खोह स्थित महाकाली स्थित हैं। महाकाली के  उत्पत्ति का आधार प्रलय काल से जुड़ा हुआ बताया जाता है। कहा जाता है कि एक  बार विष्णु भगवान शेषनाग पर योग निद्रा में लीन थे। उस समय उनके कानों की  मैल से दो बलशाली असुर उत्पन्न हुए। बाद में दोनों असुर मधु और कैटभ ·के नाम से विख्यात हुए। दोनों को  अपनी ताकत का  अहंकार हो गया। यहां तक कि दोनों ब्रह्मा का  ही वध करने के  लिए कटिबद्ध हो गए। ब्रह्मा को  जब इसका  आभास हुआ तब उन्होंने योग निद्रा महाकाली  की  उपासना की। तब जाकर विष्णु की नींद टूटी। ब्रह्मा को  संकट में देख भगवान विष्णु ने मधु और कैटभ नामक  दोनों राक्षसों का  संहार कर दिया। महाकाली को  विष्णु की  योग निद्रा के  रूप में भी जाना जाता है। महाकाली की  उत्पत्ति ब्रह्मा की  उपासना से मानी जाती है। ममता एवं शक्ति की  प्रतिमूर्ति मां विंध्यवासिनी ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव द्वारा अहर्निश सेवित हैं।
मां विंध्यवासिनी आदि शक्ति ब्रह्मा की  शक्ति है। मां विंध्यवासिनी के  यहां प्रतिष्ठापित होने का  प्रमाण प्राचीन काल से ही मिलता है। मां विंध्यवासिनी का  इतिहास दक्ष कुमारी सती से भी जुड़ा हुआ है। सती का  शरीर लेकर भगवान शिव मोह वश जब पूरे ब्रह्मांड में घूमने लगे तब विष्णु को  आगे आना पड़ा। भगवान विष्णु ने अपने धनुष से लक्ष्यवेध द्वारा सती के शरीर को  खंड-खंड कर दिया। सती के  वे अंग जहां-जहां गिरे वहीं महालक्ष्मी हो गई। उसी समय सती का  एक  अंग कटकर यहां भी गिरा था। तभी से विंध्यवासिनी यहां विराजमान हैं।