अटल विश्वास ही है अक्षयवट
प्रयागराज में दर्शन करने लगे श्रद्धालु
राजमणि त्रिपाठी
गंगा ,यमुना और सरस्वती के संगम पर इस समय आस्था और धर्म की धारा बह रही है। माघ महीने में सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करते ही पावन नगरी प्रयागराज में देवता आकर निवास करने लगते हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है कि माघ मकर रवि गति जब होई तीरथपतिहिं आव सब कोई। इस वर्ष तो आस्था और विश्वास की नगरी प्रयाग में अर्द्ध कुम्भ चल रहा है। जिसे विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक मानव मेला भी कहा जाता है। इस बार इस धार्मिक महोत्सव में सबसे बड़ी बात यह है कि श्रद्धालु अक्षयवट का दर्शन करके अपनी धार्मिक यात्रा को पूरा कर सकेंगे।
अकबर के शासन काल से ही अक्षयवट का दर्शन नहीं हो पा रहा था। कारण था कि अकबर ने जब किला का निर्माण कराया तो अक्षयवट सहित मंदिर भी किले की परिधि में आ गए और श्रद्धालु दर्शन से वंचित हो गए। एक लम्बे समय के बाद उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 10 जनवरी, 2019 को इस वटवृक्ष को हिन्दू श्रद्धालुओं के लिए खोल दिया। यही नहीं सरस्वती कूप में देवी सरस्वती की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा भी की। अकबर नई गंगा जमुनी तहजीब को परवान चढ़ाना चाहता था शायद इसी लिए अकबर ने वहां एक किला बनाने का निर्णय लिया। किला बना, पर हिंदुओं के लिए सर्वाधिक पवित्र अक्षयवट वृक्ष और कई मंदिर इस किले की परिधि में आ गए। अकबर ने मंदिरों को नष्ट नहीं किया। बाहर से अक्षयवट के तने की पूजा श्रद्धालु करते रहे। तभी से अक्षयवट वृक्ष किले में हिंदुओं की पहुंच से दूर हो गया था पर अर्द्ध कुम्भ का यह अवसर उनके लिए वरदान साबित हुआ। उत्तरप्रदेश सरकार ने इसे दर्शन के लिए खोल दिया।
बटु बिस्वास अचल निज धरमा। तीरथराज समाज सुकरमा॥
सबहि सुलभ सब दिन सब देसा। सेवत सादर समन कलेसा॥
धर्म में जो अटल विश्वास है, वह अक्षयवट है और शुभ कर्म ही उस तीर्थराज का समाज है। वह संत समाज रूपी प्रयागराज सब देशों में, सब समय सभी को सहज ही में प्राप्त हो सकता है और आदरपूर्वक सेवन करने से दुखों को नष्ट करने वाला है। तीर्थराज अलौकिक और अकथनीय है एवं तत्काल फल देने वाला है, उसका प्रभाव प्रत्यक्ष है। जो मनुष्य इस संत समाज रूपी तीर्थराज का प्रभाव प्रसन्न मन से सुनते और समझते हैं और फिर अत्यन्त प्रेमपूर्वक इसमें गोते लगाते हैं, वे इस शरीर के रहते ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष- चारों फल पा जाते हैं। इस तीर्थराज में स्नान का फल तत्काल ऐसा देखने में आता है। यह सुनकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि सत्संग की महिमा छिपी नहीं है। वेदों में और लोक में इनकी प्राप्ति का दूसरा कोई उपाय नहीं है। सत्संग के बिना विवेक नहीं होता और श्री राम की कृपा के बिना वह सत्संग सहज में मिलता नहीं। सत्संगति आनंद और कल्याण की जड़ है। सत्संग की प्राप्ति ही फल है और सब साधन तो फूल है।
जहां तक अक्षयवट का सवाल है इसका वर्णन पुराणों और प्रमुख धार्मिक ग्रंथो में मिलता है। मत्स्य पुराण के अनुसार प्रलय होने बाद और युगों की समाप्ति पर भी महत्वपूर्ण है यह वटवृक्ष खड़ा रहता है। अक्षयवट प्रयागराज में यमुना के तट पर स्थित है। बताया जाता है कि विष्णु इस वृक्ष पर बाल रूप में रहते हैं और प्रलय के बाद नई सृष्टि की रचना करते हैं। अक्षयवट के नाम से जाने जाने वाले इस वट का कभी क्षय नही होता है। अब इसी वट को उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोल दिया है। यह भी कहा जाता है कि मुग़ल शासकों ने इस वट को नष्ट करने की बड़ी कोशिश की पर सफल नहीं हो पाए। परिणाम स्वरुप इसे हिन्दुओं से दूर कर दिया गया लेकिन आज भी यह अक्षयवट सनातन धर्मावलम्बियों में नवीन आशा का संचार करता रहता है। श्रद्धालुओं और संतों की लगातार मांग के बाद भी किसी सरकार ने इस वृक्ष के दर्शन के लिए कोई कोशिश नहीं की। अंतत; उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रयासों से यह संभव हो गया।
पौराणिक कथाओं और रामचरित मानस के अनुसार प्रयाग में स्नान के बाद अक्षय वट का पूजन एवं दर्शन जरूर करना चाहिए। इसके दर्शन के बाद ही प्रयागराज की यात्रा पूरी होती है। मोक्ष प्राप्ति के लिए लोग इस वट के दर्शन करने आते है। अक्षय वट वृक्ष के नीचे से ही अदृश्य सरस्वती नदी के बहने की भी परिकल्पना की जाती है। यह भी वर्णित है कि ब्रह्मा जी ने प्रयाग ( वटवृक्ष के नीचे) पहला यज्ञ किया था। इसमें समस्त देवी-देवताओं का आह्वान किया गया था।
फिलहाल अक्षयवट प्रयागराज की धार्मिक यात्रा की कहानी आज भी कह रहा है। लोग दूर से ही इसका दर्शन कराकर अपने को धन्य मानते हैं। बहरहाल आस्था का प्रतीक यह अक्षयवट आज भी विशालता को बनाए हुए लहलहा रहा है। वट वृक्ष के नजदीक जाने पर आज भी लगता है कि यह वट बूढ़ा नहीं है और लोगों की आस्था का केंद्र बना है।