Saturday, October 27, 2018

कार्तिक मास में तुलसी पूजा और विष्णु आराधना फलदायी

कार्तिक मास में तुलसी पूजा और विष्णु आराधना फलदायी
राजमणि त्रिपाठी
कल्याण। धार्मिक दृष्टि से तुलसी का विशेष महत्वपूर्ण स्थान है। विशेषकर कार्तिक महीने में तुलसी की पूजा और तुलसी विवाह की परंपरा सदियों से चली आ रही है। कार्तिक मास शुरू हो गया है। कार्तिक मास में तुलसी पूजा का विशेष महत्व बताया गया है। कहते हैं तुलसी की पूजा करने से सभी  मनोकामनायें   पूरी हो जाती हैं। शास्त्रों में चातुर्मास में आने वाले कार्तिक मास को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष देने वाला माना गया है। गीता में उल्लेख मिलता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहा है कि पौधों में तुलसी ,मासों में कार्तिक , दिवसों में एकादशी और तीर्थों में द्वारिका मुझे प्रिय है।
 तुलसी के जन्म के विषय में अनेक पौराणिक कथाएं मिलती हैं। इसमें जालंधर राक्षस तथा उसकी पत्नी वृंदा की कथा प्रमुख मानी गई है। पद्मपुराण में जालंधर तथा वृंदा की कथा दी गई है। बाद में वृंदा तुलसी रुप में जन्म लेकर भगवान विष्णु की प्रिय सेविका बनी। अपने सतीत्व तथा पतिव्रत धर्म के कारण ही वृंदा विष्णुप्रिया कहलाई। शालिग्राम रुप में भगवान विष्णु तुलसी जी के चरणों में रहते हैं। उनके मस्तक पर तुलसीदल चढ़ता है।
कार्तिक माह में तुलसी पूजन करने का विशेष महत्व बताया गया है। पुराणों एवं हिन्दू ग्रंथों में कहा गया है कि  घर में सदैव शुभ कर्म , सदैव सुख शान्ति के लिए तुलसी की आराधना अवश्य करनी चाहिए।
 कार्तिक मास में तुलसी के समीप दीपक जलाने से मनुष्य अनंत पुण्य का भागी बनता है।  तुलसी की पूजा करने वाले के घर मां लक्ष्मी का हमेशा निवास होता है। तुलसी में साक्षात लक्ष्मी का निवास माना गया है।  कार्तिक मास में तुलसी पूजन से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
तुलसी का प्रतिदिन दर्शन करना पापनाशक बताया गया है तथा पूजन करना मोक्षदायक। देवपूजा और श्राद्धकर्म में तुलसी आवश्यक है। तुलसी दल से पूजा करने से व्रत, यज्ञ, जप, होम, हवन करने का पुण्य प्राप्त होता है। कहते हैं भगवान श्रीकृष्ण को तुलसी अत्यंत प्रिय है। तुलसी को जल अर्पित करते समय  मंत्र जाप विशेष फलदायी होता है।
महाप्रसाद जननी, सर्व सौभाग्यवर्धिनी
आधि व्याधि हरा नित्यं, तुलसी त्वं नमोस्तुते।।
बहरहाल कार्तिक मास शुरू होते ही हर घरों में तुलसी की पूजा होने के साथ ही भगवान नारायण ,गोविन्द की पूजा होने लगी है।  कार्तिक मास में दोनों एकादशी का विशेष महत्व होता है।  एकादशी का व्रत करने से समस्त पापों का विनाश हो जाता है लेकिन ध्यान रहे इस दिन तुलसी के पत्ते को नहीं तोड़ना चाहिए। कार्तिक मास में महिलाएं ब्रह्म मुहूर्त में ही गंगा या फिर कुएं पर स्नान करती हैं जिसे प्रात स्नान कहते हैं। स्नान के बाद ुलसी को जल अर्पित कराती हैं और भगवान विष्णु की आराधना कराती हैं।  बहरहाल कार्तिक मास में विष्णु उपासना और तुलसी पूजा फलदायी और पापों का विनाश होता है।    

Sunday, September 9, 2018

आस्था का केंद्र राजराजेश्वरी दुर्गा मंदिर महरछा


राजमणि त्रिपाठी
 आदि शक्ति हैं माँ दुर्गा । माँ भगवती के अनेक रूप और नाम हैं । भक्त इन्हीं स्वरूपों  के विभिन्न नामों से पूजा, अर्चना करते हैं । माँ भगवती का एक नाम राजराजेश्वरी भी है। इनका स्वरूप मोहक एवं  आकर्षक है। इलाहाबाद जिले  में वरूणा तट पर स्तिथ महरछा, रध्ईपुर गांव  में राजराजेश्वरी दुर्गा मां का विशाल एवं भव्य मंदिर है,जो भक्तों की आस्था का केंद्र बन गया है।
 राजराजेश्वरी देवी माँ का दर्शन करने के लिए  23 सीढियां चढ़नी पडती हैं । माँ राजराजेश्वरी सिंह पर सवार हैं और आठ भुजाओं वाली हैं। इनकी प्रतिमा अत्यंत मनमोहक और आकर्षक है। प्रतिमा करीब 9  कुन्तल की है। रात में  मंदिर की सजावट भक्तों का मन मोह लेती है। इनके दर्शन के  लिए  भक्त दूर दूर से आते हैं। अब माँ राजराजेश्वरी का यह मंदिर भक्तों की आस्था और विश्वास का केंद्र बन गया है। यहां  नवरात्र और हर मंगलवार को  भक्तों की अपार भीड़ होती है। वैसे रोज सुबह से ही दर्शनाथियों का आना जाना लगा रहता है।
पंडित ठाकुर प्रसाद चेरिटेबल न्यास द्वारा संचालित यह मंदिर करीब 55 फिट ऊँचा है। पूरी तरह मार्बल से निर्मित इस मंदिर के संस्थापक हैं राजमणि  त्रिपाठी।  मंदिर का निर्माण तीन वर्षों के अथक प्रयास से माँ दुर्गा की कृपा से हुआ । मंदिर का एक अपना इतिहास है। इस मंदिर के निर्माण के लिए जगह ही नहीं मिल पा रही थी। करीब 7 वर्षों की कोशिश के बाद जगह मिली और मंदिर का निर्माण हो गया। बताते हैं कि राजमणी त्रिपाठी का यह सपना उनके ही सतत प्रयास का परिणाम है। इस मंदिर के निर्माण में उन्होंने "तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा"  की तर्ज पर अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। राजमणि त्रिपाठी का कहना है कि माँ की कृपा और आशीर्वाद से ही मंदिर का निर्माण संभव हो पाया। बहरहाल मंदिर की भव्यता को देखकर  भक्त मनमुग्ध हो जाते हैं। माँ के इस पवित्र धाम में नियमित पूजा ,अर्चना होती है। पूजा के लिए  पुजारियों की नियुक्ति की गई है। प्रतिदिनं सुबह  शाम माँ भगवती की आरती होती है। दोपहर में भोग लगता है। पुजारी शशिकांत पांडे मां की सेवा मंदिर की देखरेख व्यवस्थित तरीके से करते हैं। मंगलवार की मध्यान्ह आरती आकर्षण का केंद्र होती है। भक्त माँ के दरबार में विशेष  धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
  न्यास बोर्ड के अलावा मंदिर की  देखरेख के लिए प्रबंध समिति है। प्रबंध समिति के सदस्य अहक नारायण, महेंद्र शुक्ल, विजयशंकर तिवारी ,सुशील कुमार त्रिपाठी , सुधीर  ,निर्मल और अनिल त्रिपाठी उर्फ़  गोरे, दशरथ शुक्ल , आनंद शुक्ल और पिंटू शुक्ल   देखरेख में तत्पर रहते हैं। मंदिर प्रशासक के रूप में सुधीर त्रिपाठी  कार्यरत हैं । मंगलवार मेले के दिन विशेष  व्यवस्था की जाती है । शनिवार को श्री रामचरित मानस के सुंदरकांड का पाठ होता है। भक्तों का कहना है कि माँ राजराजेश्वरी हर लोगों को मनवांछित फल देती हैं । अब लोग यहां मन्नत मानते हैं और जगदम्बा उनकी मुराद पूरी करती हैं। भक्तों में महिलाएं ,पुरूष, बच्चे ,बुजुर्ग सभी का समावेश होता है। मुराद पूरी होने पर भक्त गाजे बाजे और निशान के साथ माँ राजराजेश्वरी के दर्शन के लिए आते हैं। यही नहीं लोग अपनी मन्नत के अनुसार मंदिर में अनेक धार्मिक अनुष्ठान करवाते हैं।
 माँ भगवती के इस मंदिर में चैत और क्वार के अलावा स्थापना दिवस को विशाल भंडारा का आयोजन किया जाता है। स्थापना दिवस प्रत्येक २ मार्च को उत्साह और हर्षोल्लास से मनाया जाता है। मंदिर में माँ दुर्गा की प्राण प्रतिष्ठा का यह चौथा वर्ष है  प्राण प्रतिष्ठा २ मार्च १९१५ को हुई थी।  इस वर्ष भी २ मार्च को स्थापना दिवस मनाया जाएगा। कोई भी भक्त आस्था और तन ,मन और धन से भंडारा में शामिल हो सकता है।  भक्तों की हर मुराद पूरा करने वाली माँ राजराजेश्वरी दुर्गा माता  आस्था और विश्वास का केंद्र बन गई हैं । दुर्गा शक्तिपीठ रधईपुर के नाम से विख्यात यह पावन और पवित्र स्थल गांव  के धर्ममय वातावरण की कहानी का गवाह बन गया है।