Wednesday, December 14, 2011

विंध्यवासिनी

विंध्याचल प्राचीन काल  से ऋषि मुनियों की  तपस्थली रही है। उत्तर प्रदेश के  मिर्जापुर में स्थित विंध्याचल में ही निवास करती हैं मां विंध्यवासिनी। विंध्यवासिनी एक  शक्ति पीठ के रूप में जानी जाती हैं। यह शक्ति पीठ हमेशा से भक्तों की  आस्था  का  केन्द्र बना हुआ है। तांत्रिक  दृष्टि से भी दुर्लभ स्थान माना जाता रहा है विंध्याचल क्योंकी यहां तीन देवियों का त्रिकोण है। ये तीन शक्तियां हैं- महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती।
विंध्यवासिनी पूर्वांचल की  सर्वाधिक  प्रसिद्ध देवी हैं। मिर्जापुर जिले के  अंतर्गत विंध्याचल रेलवे स्टेशन के समीप ही गंगा के  तट पर विंध्यवासिनी देवी का  मंदिर स्थित है।
पुराणों में मां विंध्यवासिनी की  अनेक कथाएं मिलती हैं। मार्कडेय पुराण के  अनुसार देवी ने स्वयं कहा है कि  जब शुंभ-निशुंभ नाम· महादैत्य उत्पन्न होंगे, तब मैं नंद गोप के  यहां उनकी पत्नी यशोदा के  गर्भ से उत्पन्न होकर विंध्याचल पर्वत पर जाकर रहूंगी और उन दोनों असुरों का  वध करूंगी। श्रीमद्भागवत महापुराण में भी उल्लेख मिलता है कि  वसुदेव कंस के  भय से अपनी पत्नी देवकी   के  आठवें गर्भ से उत्पन्न श्रीकष्ण को  रातोंरात गोकुल  में नंद गोप के  यहां पहुंचाकर वहां उसी समय उनकी पत्नी यशोदा के गर्भ से पैदा हुई कन्या को लेकर मथुरा के कारागार में वापस लौट आए। कंस जब उस कन्या को  पत्थर पर पटक कर मारना चाहता था तभी वह अद्भुत कन्या उसके  हाथों से निकल कर आकाश गामिनी हो जाती है और कंस के  वध की भविष्यवाणी कर के  विंध्याचल पर्वत पर आकर विराजमान हो गईं। एक  अन्य कथा में यह कहा गया है कि क्षीर सागर के  तट पर जब स्वायंभू मनु ने देवी की आराधना करते हुए सौ वर्षों तक  घोर तपस्या की  तब देवी ने प्रकट होकर उन्हें मनोवांछित वर प्रदान किए तथा भगवती स्वयं विंध्याचल पर स्थित होकर विंध्यवासिनी कहलाईं।
महाकाली की  भी उत्पत्ति की  एक  अलग कहानी है। श्री यंत्र पर बसे विंध्य धाम के  दक्षिण कोण में काली   खोह स्थित महाकाली स्थित हैं। महाकाली के  उत्पत्ति का आधार प्रलय काल से जुड़ा हुआ बताया जाता है। कहा जाता है कि एक  बार विष्णु भगवान शेषनाग पर योग निद्रा में लीन थे। उस समय उनके कानों की  मैल से दो बलशाली असुर उत्पन्न हुए। बाद में दोनों असुर मधु और कैटभ ·के नाम से विख्यात हुए। दोनों को  अपनी ताकत का  अहंकार हो गया। यहां तक कि दोनों ब्रह्मा का  ही वध करने के  लिए कटिबद्ध हो गए। ब्रह्मा को  जब इसका  आभास हुआ तब उन्होंने योग निद्रा महाकाली  की  उपासना की। तब जाकर विष्णु की नींद टूटी। ब्रह्मा को  संकट में देख भगवान विष्णु ने मधु और कैटभ नामक  दोनों राक्षसों का  संहार कर दिया। महाकाली को  विष्णु की  योग निद्रा के  रूप में भी जाना जाता है। महाकाली की  उत्पत्ति ब्रह्मा की  उपासना से मानी जाती है। ममता एवं शक्ति की  प्रतिमूर्ति मां विंध्यवासिनी ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव द्वारा अहर्निश सेवित हैं।
मां विंध्यवासिनी आदि शक्ति ब्रह्मा की  शक्ति है। मां विंध्यवासिनी के  यहां प्रतिष्ठापित होने का  प्रमाण प्राचीन काल से ही मिलता है। मां विंध्यवासिनी का  इतिहास दक्ष कुमारी सती से भी जुड़ा हुआ है। सती का  शरीर लेकर भगवान शिव मोह वश जब पूरे ब्रह्मांड में घूमने लगे तब विष्णु को  आगे आना पड़ा। भगवान विष्णु ने अपने धनुष से लक्ष्यवेध द्वारा सती के शरीर को  खंड-खंड कर दिया। सती के  वे अंग जहां-जहां गिरे वहीं महालक्ष्मी हो गई। उसी समय सती का  एक  अंग कटकर यहां भी गिरा था। तभी से विंध्यवासिनी यहां विराजमान हैं।

Tuesday, October 4, 2011

पापांकुशा एकादशी: आश्विन (क्वार) शुक्ल


धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से आश्विन (क्वार) शुक्ल एकादशी का  नाम पूछ कर इसके   व्रत की  विधि तथा फल को  जानने की  इच्छा प्रकट की  थी। तत्पश्चात श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा था कि  धर्मराज पापों का  नाश करने वाली इस एकादशी का  नाम पापांकुशा एकादशी है। इस दिन मनुष्य को  विधिपूर्वक  भगवान पद्मनाभ की पूजा करनी चाहिए। इस एकादशी व्रत से मनुष्य को मनवांछित फल मिलता है और उसे स्वर्ग की  प्राप्ति होती है।
भगवान गरुड़ध्वज की पूजा एवं नमन से जो फल मिलता है वह फल मनुष्य को  बहुत दिनों तक  कठोर तपस्या से मिलता है। जो मनुष्य अज्ञानता से अनेक  पाप करते हैं, परंतु हरि को  नमन करते हैं, वे नरक  में नहीं जाते। विष्णु के  नाम के कीर्तन मात्र से संसार के सब तीर्थों के पुण्य का  फल मिल जाता है। जो मनुष्य भगवान विष्णु की  शरण में जाते हैं, उन्हें कभी भी यम यातना नहीं भोगनी पड़ती है।
श्री कृष्ण ने धर्मराज को  बताया कि   जो मनुष्य वैष्णव होकर शिव की और शैव होकर विष्णु की निंदा करते हैं, वे अवश्य ही नरक वासी होते हैं।  वाजपेय और अश्वमेध यज्ञों से जो फल  मिलता है, वह एकादशी के  व्रत के सोलहवें भाग के  बराबर भी नहीं होता है। जगत में एकादशी व्रत के बराबर कोई पुण्य नहीं। इसके  बराबर पवित्र तीनों लोको  में कुछ भी नहीं। इस एकादशी के  बराबर कोई व्रत नहीं। जब तक  मनुष्य विष्णु की  एकादशी का व्रत नहीं करते हैं, तब तक  उनकी  देह में पाप का वास होने की संभावना बनी रहती है।
पापांकुशा एकादशी स्वर्ग, मोक्ष, आरोग्यता, सुंदर स्त्री तथा अन्न और धन को देने वाली है। इस के व्रत के  बराबर गंगा, गया, काशी, कुरुक्षेत्र और पुष्कर भी पुण्यवान नहीं हैं। हरि स्मरण तथा एकादशी का  व्रत करने और रात्रि जागरण करने से मनुष्य को  सहज ही विष्णु का  स्नेह प्राप्त होता है। इस व्रत को करने वाला मनुष्य मातृ, पितृ पक्ष, स्त्री पक्ष तथा मित्र पक्ष की दस पीढिय़ों का उद्धार कर देता है। वह दिव्य देह धारण कर गरुड़ पर सवार होकर विष्णु लोक को  जाता है।
बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में इस व्रत को करने से पापी मनुष्य भी सदगति को  प्राप्त होता है। आश्विन मास की  शुक्ल पक्ष की  इस पापांकुशा एकादशी का  व्रत जो मनुष्य करते हैं, वे अंत समय में हरिलोक को  प्राप्त होते हैं तथा समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं। सोना, तिल, भूमि, गौ, अन्न, जल, छतरी तथा जूती दान करने से मनुष्य यमराज को नहीं देखता।
जो मनुष्य किसी  प्रकार का  पुण्य कर्म किए बिना जीवन के दिन व्यतीत करता है, वह निर्जीव के समान ही है। निर्धन मनुष्यों को  भी अपनी शक्ति के अनुसार दान करना चाहिए तथा धनवालों को सरोवर, बाग, मकान आदि बनवाकर दान करना चाहिए। ऐसे मनुष्यों को  यम का  द्वार नहीं देखना पड़ता तथा संसार में दीर्घायु होकर धनाढ्य, कुलीन और रोग रहित रहते हैं।

Monday, October 3, 2011

सृष्टि की आदि शक्ति हैं मां दुर्गा

आदि शक्ति हैं मां दुर्गा। देवताओं पर मां भगवती की कृपा रहती है। समस्त देव उन्हीं की शक्ति से प्रेरित होकर कार्य   करते हैं। यहां तक की ब्रह्मï विष्णु और महेश बिना भगवती की  इच्छा या शक्ति से सर्जन, पोषण एवं संहार नहीं कर पाते हैं। परमेश्वरी के नौ रूप हैं। उन्हें अनेक  नामों से जाना जाता है। इन नौ रूपों का  अलग-अलग आध्यात्मिक  महत्व है। देवी के नौ रूपों का वर्णन दुर्गा सप्तशती में भी मिलता है। देवी के  रूपों का रहस्योद्घाटन प्रजापति ब्रह्मï ने मार्कण्डेय जी से कि या था। मार्कण्डेयजी ने प्रजापति से मनुष्यों की  रक्षा करने वाले अति गोपनीय साधन जानने की  इच्छा जाहिर की तो उन्होंने बताया कि   देवी कवच ही एक  मात्र परम गोपनीय साधन है। इनके स्मरण से मनुष्यों का  उपकार हो जाता है। ब्रह्मï ने बताया कि  देवी की  नौ मूर्तियां हैं इन्हें ही नव दुर्गा कहा जाता है। चारिणी। दुर्गा का तीसरा स्वरूप चन्द्रघंटा के नाम से प्रसिद्ध है। चौथे स्वरूप को कुष्माडा कहते हैं। पांचवीं दुर्गा का नाम स्कंदमाता और छठा रूप कात्यायनी है। देवी का  सातवां नाम कालरात्रि और आठवां महागौरी है। नवी दुर्गा का  नाम सिद्धिदात्री है। अधीश्वरी हैं। पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं इसी से इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। नव दुर्गाओं में प्रथम शैलपुत्री का  वाहन वृषभ है। इनके  दाहिने हाथ में त्रिशूल तथा बाएं हाथ में कमल पुष्प सुशोभित होता है। पूर्व जन्म में शैलपुत्री दक्ष की पुत्री थी। उस समय इनका नाम सती था। इनका विवाह भगवान शिव से हुआ था। अनंत शक्तियों से शक्तिमान हैं शैल पुत्री। नवरात्रि के  प्रथम दिन इन्हीं की  पूजा एवं उपासना होती है। योगी अपनी योग साधना का  शुभारंभ करते हैं और अपने मन को  मूलाधार चक्र  में स्थित करते हैं। दूसरा स्वरूप ब्रह्मïचारिणी का  है। ब्रह्मïचारिणी में निहित है तप का आचरण। इस रूप में मां दुर्गा अपने दाएं हाथ में भाला एवं बाएं हाथ में कमंडल धारण करती हैं। ब्रह्मचारिणी भी हिमालय की  ही पुत्री हैं और इनका  भी विवाह भगवान शंकर से ही हुआ है। नवरात्रि के  दूसरे दिन इनकी  पूजा की  जाती है। ब्रह्मचारिणी की  पूजा अर्चना से अनंत फल मिलता है। मनुष्य में तप, संयम एवं सदाचार की वृद्धि होती है।  तीसरे दिन भगवती चंद्रघंटा की  पूजा का  विधान है। यह स्वरूप कल्याणकारी होता है। चन्द्रमा इनके  घंटा में स्थित है इसी कारण इनका नाम चंद्रघंटा है। दुर्गा चंद्र घंटा के  दस हाथ है। इनका वाहन सिंह है। हाथों में अस्त्र-शस्त्र सुसज्जित हैं। दानव इनसे सदैव डरते हैं। चंद्रघंटा की कृपा से पाप एवं बाधाएं दूर हो जाती हैं। इनकी मुद्रा सदैव युद्ध के  लिए उत्तेजित रहती है। इनकी साधना कल्याणकारी है। का  चौथा स्वरूप कुष्मांडा है। ब्रह्माण्ड  को उत्पन्न करने के  कारण ही इनका  नाम कुष्मांडा पड़ा। अपनी मुस्कान से ब्रह्माण्ड की  रचना करने वाली कुष्मांडा सृष्टि की  आदि शक्ति हैं। इनकी  आठ भुजाएं हैं इनका  भी वाहन सिंह है। इन्हें अष्टभुजा नाम से भी जाना जाता है। चौथे दिन इनकी  पूजा की जाती है। इस दिन साधक का  मन अनाहत चक्र  में स्थित होता है। कोई भी देवता इनके  तेज का  सामना नहीं कर सकता। इनकी उपासना से भक्तों के  रोग एवं शोक  नष्ट हो जाते हैं। का  पांचवां स्वरूप है  स्कंदमाता का । भगवान स्कन्द  यानी कार्तिकेय की  माता होने से इन्हें स्कन्द  माता के  नाम से जाना जाता है। नवरात्रि के  पांचवें दिन इनकी उपासना पूजा की  जाती है। इस दिन साधक का  मन विशुद्ध चक्र  में अवस्थित होता है। स्कन्द  माता देवी की  चार भुजाएं हैं। दाहिनी तरफ की  एक  भुजा से ये पुत्र स्कन्द को    गोद में पकड़े हुए होती हैं। सिंह वाहन है स्कन्द माता का। इनकी  उपासना से समस्त इच्छाएं पूर्ण होती हैं। का  छठा स्वरूप है कात्यायनी। देवताओं का कार्य सिद्ध  करने के  लिए महर्षि कात्यायन के  आश्रम में प्रकट हुई और महर्षि ने इन्हें अपनी कन्या मान लिया। इसलिए कात्यायनी नाम से प्रसिद्ध हुई। महिषासुर का  विनाश करने वाली मां कात्यायनी ही हैं। ब्रह्म की  अधिष्ठïती देवी हैं। गोपियों ने कृष्ण को  पाने के  लिए इन्हीं की  पूजा की थी। चार भुजाओं में दाहिने तरफ की  दोनों भुजाओं में एक  वर तथा दूसरी अभय मुद्रा में होती है। इनका  स्वरूप अत्यन्त अलौकिक  है। इनका वाहन सिंह है। छठे दिन साधक  का मन आज्ञा चक्र में होता है। इनकि  पूजा से अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों फलों कि  प्राप्ति होती है। का  सातवां स्वरूप कालरात्रि का  है। नवरात्रि के  सातवें दिन इनकी   पूजा होती है। इनका  रंग काला है। त्रिनेत्रधारी हैं। गले में अद्भुत चमकीली माला धारण करती हैं। इनका वाहन गधा है। कालरात्रि को  चार भुजाएं हैं। स्वरूप भयानक  पर शुभ फल देने वाला है। कालरात्रि दुष्टों का  विनाश करती हैं। इनकी कृपा से मनुष्य भय मुक्त रहता है। का  आठवां स्वरूप महागौरी का  है। इनके  वस्त्र एवं आभूषण श्वेत हैं। वाहन वृषभ है। चार भुजाएं हैं और दिव्य स्वरूप है। कठोर तपस्या में इनका शरीर काला हो गया था। तब भगवान शिव ने गंगा जल से धोया। तब उनका शरीर गोरा हो गया और इनका  नाम महागौरी पड़ गया। इनकी कृपा से अलौकिक  सिद्धियों की  प्राप्ति होती है। इनकी  पूजा आठवें दिन होती है। के  नवें दिन दुर्गा के  नवें स्वरूप सिद्धिदात्री की  पूजा होती है। ये सभी प्रकार की  सिद्धियों को  देने वाली हैं। मार्कण्डेय पुराण में भी इसका  उल्लेख मिलता है। भगवान शिव ने इनकी कृपा  से भी सिद्धियां प्राप्त की  थी। वाहन सिंह है। चार भुजाएं हैं मां सिद्धिदात्री को मल पुष्प पर विराजमान मां की  पूजा से सभी कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। के  माध्यम से मानव की  हर कामना को पूरा करती हैं। जो इनकी शरण में होता है उनका कोई अमंगल नहीं होता है। देवी का  भक्ति पूर्वक  स्मरण करने से कल्याण होता है। देवी ही शक्ति हैं। इनके बिना कोई भी काम संभव नहीं होता है।

Saturday, October 1, 2011

DIL SE

मित्रों,
    आपसे अपनी सोच, अपने विचार , अपने अनुभव बांटने के लिए मैं निरंतर
इस ब्लॉग के माध्यम से  जुड़ता रहूँगा| पत्रकारिता जगत के साथ साथ   मेरे
आध्यात्मिक अनुभव एवं आप सबसे बांटे गए दुःख सुख इस ब्लॉग का हिस्सा
होंगे| जीवन की जिस पायदान पर मैं आज हूँ वहां तक पहुँचने  में आप सबका स्नेह
और आशीर्वाद मुझे सदा मिलता रहा है|
आपका,
राज

Saturday, March 5, 2011

SWAGAT

मित्रों,
       आप जैसे विद्वान मित्रों से सुसंवाद स्थापित करने की प्रबल इच्छा से आज यह ब्लॉग शुरू
कर रहा हूँ| समय समय पर आपसे इस माध्यम से मिलता रहूँगा|  मेरा प्रयाग से मुंबई तक का
सफ़र आप सब के सामने है| फिर भी कुछ न कुछ अनकही बातें हृदय में  बंद रहती हैं,  इस
ब्लॉग के माध्यम वही भावनाएं आप तक पहुंचा सकूँ तो अपने आप को धन्य समझूंगा|
आपका अपना,
       राज